शाम मस्तानी🌹

वो शाम भी क्या खूब मस्तानी थी ,

जब वो मेरा बालकनी से इंतजार करती ।

मेरी एक झलक पाने के लिए ,

घंटों तक खड़ी इंतजार करती ।

मैं भी कभी उसे निराश न करता,

हर शाम उसके सामने से ,उस गली से गुजरता।

शर्मिला था बचपन से,आंखे चुरा लेता देख उसे,

उसके घंटों की इंतजार को पल भर में चूर चूर कर दिया करता था मै,

पर फिर भी मेरी इतनी नादानियों को क्या खूब झेलती थी वो,

हर दिन ठीक उसी वक्त,उसी जगह नजर आ जाती वो।

कैसे मना करता उसे,तू इतना मत दिल लगा,

नहीं अच्छा लगता रोज रोज तेरा दिल तोड़ना

जिंदगी थी उलझी, भविष्य की फ़िक्र थी,

अपने सपनों के सामने,दिल की ना सुनी थी

दिमाग ने काबू कर रखा था ,सपनों के चंगुल में बांध रखा था।

पर अब जब दिल की सुनने लगा हूं ,

उसका कोई अता पता ही नहीं।

अब जब गुजरता हूं उस गली से,सब कुछ सूना सा लगता है,

बालकनी पर उसकी जगह कोई और ही खड़ा मिलता है।।बालकनी पर उसकी जगह कोई और ही खड़ा मिलता है।।

—Nimish ©

Kota memories ❤️

Don’t wait for everything to be perfect before you decide to enjoy your life

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23 thoughts on “शाम मस्तानी🌹

  1. Thank you so much mam☺️☺️🌹
    दिल से लिखते ,writing apne aap acchi ho jaati . नहीं तो डॉक्टर की राइटिंग माशाल्लाह 😂😂🤓

    Liked by 1 person

    1. शुक्रिया ज्योति ☺️☺️🌹🌹
      कविता में भाव ना हो तो, कविता निबंध सी बन जाती हैं।फिर चाहे किसी भाषा में लिखी जाए☺️👍

      Liked by 1 person

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