सजग रहना पहरेदार

अमावस की रात बीती , किन्तु

पूनम का चाँद उगना शेष है !

शत्रु जरूर है लहूलुहान , परन्तु

मन में भरे घोर मलिनता द्वेष है  !!
.

नापाक है पड़ोसी ,

नापाक इरादों से सन्नद्ध !

आतंक के स्त्रोत से ,

अमन की अपेक्षा हास्यस्पद  !!
.

‘घर के भेदी’ भी असंख्य ,

जयचंद मिले पग-पग पर  !

अपनी ही माँ को कोसते ,

टुकड़े करने का दम भरते !!
.

तीर कमान में टिकी रहें ,

असुरों का एक अवशेष न बचे !

नव अंकुरित बीज तो उग आये ,

घाटी में , कुसुम खिलना है शेष

कुसुम खिलना है शेष….

—-Nimish

जम्मू कश्मीर बॉर्डर पर मुस्तैद सेना के हर जवान को समर्पित …

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35 thoughts on “सजग रहना पहरेदार

  1. जय हिंद। आपने इतना खूबसूरत कविता लिखा है जिसकी व्याख्या करना कठिन है। दिल जीत लिया आपने। और हमें मजबूर कर दिया छेड़ने पर——अच्छा नही भी लगेगा फिर भी हमने छेड़छाड़ कर दिया।

    अमावस की रात बीती ,
    चाँद पूनम का उगना शेष है ,
    शत्रु लहूलुहान बेशक मगर,जंग अभी शेष है।
    नापाक है पड़ोसी ,
    नापाक इरादों से सन्नद्ध,
    आतंक के स्त्रोत से ,
    अमन की अपेक्षा हास्यस्पद,
    मन में घोर मलिनता भरे,
    दिल में भरा द्वेष है,
    शत्रु लहूलुहान बेशक मगर,जंग अभी शेष है।
    जयचंद बसे पग-पग पर,
    गिरगिट सा रंग बदलते हैं,
    अपनी माँ को ही कोस,कोस उसे,
    टुकड़े करने का दम भरते हैं,
    तीर कमान पर सज्ज,
    असुरों का मिटना शेष है,
    नव अंकुरित बीज तो उग आये घाटी में ,
    कभी कुसुम खिलना शेष है।

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      1. चलिए अच्छा लगा जानकर की आपको अच्छा लगा। वैसे ये आपकी अमानत है। स्वागत आपका।

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