कला जोड़ती है

जब बड़े परदे पर ‘बच्चन’ आता है और कहता है ” नाम है शहंशाह “, तो भीड़ का चेहरा अचानक खिल उठता है , लोग भूल जाते है… भूल जाते है – हार घरबार , निराशा अभिलाषा , पाप विलाप , लोभ छोभ और सब कुछ भूल-भुलाकर चंद घंटे उस कला , उस चलचित्र का लुफ्त लेते है , है ना ?

कला कुछ ऐसी ही होती…आसान शब्दों में कहूं तो कला चंचल होती , दौड़ती भागती , लोहे की तारें , ऊँची दीवारे , बॉर्डर सब कूद-फांद जाती है…अस्त्र-शस्त्र सब बौने दिखते है कला के सामने !! लाख मलिनता , बुराई , द्वेष , असमानता सबको एक किनारे कर कला सबको साथ लाती , समरसता फैलाती , एक देश को दूसरे से , एक अभिव्यक्ति को दूसरी अभिव्यक्ति से जोड़ने का काम करती है , है ना ??

जब हम पढ़ते है निराला को , दिनकर को या जब लता के मधुर स्वर या बिस्मिल की शहनाई सुनते , वीणा का रास , बासुरी की धुन , मीरा का नृत्य , कबीर के दोहे मन कितना मोहें !!! चित्रकार , शिल्पकार , मूर्तिकार , कागज पर रंगों की सजावट से लेकर मिट्टी के खिलौने आदि कला के ही तो अलग-अलग स्वरुप है जो हमारी सूनी सी जिंदगी को बसंत जितना खूबसूरत बना देते !!!

खैर हम अपनी सकारात्मक बातों का अंत करने किसी निष्कर्ष तक पहुंचते हमारे दोस्त ‘रामभरोसे’ ने टोकते हुए स्वर में कहा —

वो सब तो ठीक है पर कला-वला सबको पैसे नहीं देती , रोटी नहीं देती !!

हां ये तो है कला सब को पैसे नहीं देती ..कुछ के लिए यह आजीविका , तो बहुत सारे लोगो के लिए यह आनंद का विषय है मन में शान्ति लाने के लिए कला एक बेहतरीन जरिया है ….कला से जुड़ना ईश्वर से जुड़ने जैसा है !!!

मन की अशांति पर तो कुबेर की भी सम्पदा रोती है !!! क्यों रामभरोसे 🙂

—-Nimish

I like this video .. Coldplay fix you …see the magic of art.

https://youtu.be/AEp08vVYreg

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23 thoughts on “कला जोड़ती है

    1. Thanks bhai….Thanks for reading itna bada aur hindi post 🙂

      Usually people don’t read …They just press the lyk button. .. felt good …u read it….u r amazing bro 🙂

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  1. बहुत खूब।

    जब-जब मन ये विचलित होता
    कला हमें बहलाती है,
    चेहरे पर मुस्कान,नसों में,
    नव-यौवन भर जाती है।

    Liked by 2 people

  2. जब-जब मन ये विचलित होता
    कला हमें बहलाती है,
    चेहरे पर मुस्कान,नसों में,
    नव-यौवन भर जाती है।

    Liked by 2 people

  3. जब-जब मन ये विचलित होता
    कला हमें बहलाती है,
    चेहरे पर मुस्कान,नसों में,
    नव-यौवन भर जाती है।
    अनायास पग बढ़ने लगते,
    सपने पल में पलने लगते,
    वाह, गजब! की ध्वनि गूंजती,
    कला रंग दिखलाती,
    चेहरे पर मुस्कान,नसों में,
    नव-यौवन भर जाती है।

    बहुत खूब।

    जब-जब मन ये विचलित होता
    कला हमें बहलाती है,
    चेहरे पर मुस्कान,नसों में,
    नव-यौवन भर जाती है।

    Liked by 4 people

  4. Apart from reference to Kabirji and his Dohe, loved the post…
    Kabir does not come in the category of Kalakaar… He wrote for his Maula… He didn’t write to entertain people… it’s a different thing that people liked him and his work…
    बाकी सब बढिया है। मझा आ गया पढकर।

    Liked by 3 people

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