चित्रकार

क़ाश मैं चित्रकार या कोई रंगसाज होता... फिर जब कभी-भी तुम उदास होती , तुम्हे सामने बिठाकर , मैं तुम्हारी  खिलखिलाती हुई तस्वीर बना देता ! तुम्हारे मुरझुराए जूड़े में एक गुलाब टाँक देता...अपने ब्रश से ! हां  तुम्हारी चाँद जैसी आँखों में , तनिक शरारत भर देता ! तुमसे कितनी बार कहा है उदास [...]

व्योम

दो दूनी चार , दो तिहाई छह , स्लेट पर चॉक घिसता , भू पर पलथी मारकर बैठा , वह बालक , नहीं देखता आलिसां भवन , मोटी कमाई ; शान-शौक़त और अफ़सर बनने के सपने ; वह तो घंटी बजने और घर लौट , माँ के हाथ से दूध-भात ; बाबा के कंधे पर [...]