प्रियतम

The ultimate power of Arjun was neither his weapons nor his skills, but his complete surrender to the will of God. He questions and doubts relentlessly, but when he surrenders, he surrenders completely. That’s what faith means…☺

मेरे प्रियतम ,

मेरे कृष्ण ;

तुमने मुझे गिराया ,

और हर बार की तरह तुमने ही मुझे उठाया ;

तुमने ही सही दिशा इंगित क़ी ,

मरियल से मरीचि दिख पाने क़ी संगति दीं ;

हाथ छोड़कर भी तुम मेरा हाल दूर से देखते हो ,

कल तक नटखट थे ,

बाँसुरी से ख़ूब ज़ी बहलाया ,

आज स्वयं कुरुछेत्र में सारथी बन दिव्य ज्ञान बाँचते हो ;

तो कैसे कह दूँ की तुम मुझे अनदेखा करते हो 

तो कैसे मान लूँ की तुम मुझे अकेला छोड़ते हो 

क्यों न ?? यह कह दू !!

मेरे प्रियतम ,

तुम तो सदैव मुझे चैतन्य रखते हो ,

तुम तो सदा मेरे मन में बसते हो !!

—Nimish

Don’t ever give up…trust the Almighty , My Krishna

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12 thoughts on “प्रियतम

    1. आप क्या मस्त आदमी हो भाई …सुन्दर अभिव्यक्ति …प्रणाम

      सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं

      हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।

      अजानता महिमानं तवेदं

      मया प्रमादात्प्रणयेन वापि।।11.41।।

      ❤💫💋😃

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  1. बहुत बढ़िया भाई।👌👌
    कैसे कह दूँ की तुम मुझे अनदेखा करते हो 
    कैसे मान लूँ की तुम मुझे अकेला छोड़ते हो 
    तुम तो सदैव मुझे चैतन्य रखते हो ,
    तुम तो सदा मेरे मन में बसते हो ,
    मैं ही तुझे भूल गया था,
    मैं तो तेरा दास प्रभु
    इस जग में आकर भूल गया।

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  2. आपकी कृति है समर्पित तो करना पड़ेगा🙂
    मैं भूल जाऊँ मुमकिन है,
    हे प्रभु, हे कृष्ण,
    तुम भूल जाओ,ये मुमकिन नही,
    सो जाता है जमाना,निशा के प्रांगण में,
    और मैं भी,
    तुम सो जाओ ये मुमकिन नही।
    हमने तेरा प्रेम देखा और क्रोध भी,
    दया देखा और दंड भी,
    तूने मुरली की मधुर धुन सुनाई,
    चक्रवर्ती होकर भी सारथी बने,
    सन्धि के कई प्रस्ताव लाए,
    हर युग में हमें समझाने का प्रयत्न किया,
    मगर मैं मूढ़ माया में उलझा,
    मायापति को ना जान सका,
    तुम मेरे अंदर थे मगर तुमको ना पहचान सका,
    तूने हर बार याद कराया,मैंने तुझे भुला दी,
    मगर तुम भूल जाओ ये मुमकिन नही,
    सो जाता है जमाना,निशा के प्रांगण में,
    और मैं भी,
    तुम सो जाओ ये मुमकिन नही।
    तुम सो जाओ ये मुमकिन नही।

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    1. वाह वाह मस्त एक नंबर daddu …आपका हमेशा इतनी बढ़िया भावपूर्ण टिपण्णी करना दर्शाता है…. प्रेम 😃💫❤🚩

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      1. लिखते रहिये। मजा आता है। कुछ और लिखा है। आपकी रचना पढ़कर।समर्पित है—-
        महाभारत का युद्ध,
        कोई अपने वचन से बधें,
        कोई अपने स्वार्थ और जिद्द पर अड़े,
        सिंघासन का वारिस हक को तरसता रहा,
        स्वार्थ और छल के आगे बिबस
        या नियति को साकार करता रहा,
        जिस गोद में ने असीम प्यार दिया,
        जिस हाथों ने अनगिनत बार सहलाया,
        उसे जंगे मैदान में प्रतिद्वंदी देख,
        पार्थ के आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा,
        ऐसा नही की उसे पहले ये आभास नही था,
        मगर किससे लड़े? कौन है ऐसा जो उसका खास नही था,
        सत्य पर माया हावी होने लगा,
        खिलौने जैसा गांडीव भारी होने लगा,
        इतिहास गवाह है
        तब कर्मक्षेत्र,जंग-ए-मैदान,धर्मक्षेत्र बनने लगा,
        सारथी बने अनंता के स्वर बदलने लगा,
        अचंभित धृष्टराष्ट्र!
        प्रश्नों की झड़ी लगाते पार्थ,
        समय का पहिया ठहर गया,
        दुर्योधन को लगा अर्जुन डर गया,
        दम्भी सदैव दम्भ भरता है,
        सन्मार्गी संग नियंता सदैव रहता है,
        मायापति माया का नाश करते रहे,
        अर्जुन के हाथ गांडीव की ओर बढ़ते रहे,
        मगर हम अज्ञानी आज भी उन्हें ढूंढते हैं,
        कभी मंदिर में,कभी मस्जिद में,कभी गिरिजाघर में,
        भूल गए हम वह नित्य मेरे पास आता है,
        कभी माँ,कभी पिता,कभी सारथी बन,
        कभी भिखमंगा बन जाता है,
        हे प्रभु हमारे भी माया का नाश करना
        ताकि हम भी समझ सकें,
        ये दुनियाँ तेरी,तुम से ही साँसे चलते हैं
        ढूंढना कहाँ आपको,
        आप तो सदैव मेरे अन्तस्तल में बसते हैं !!
        आप तो सदैव मेरे अन्तस्तल में बसते हैं !!

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