मातृपूजा प्रतिबंधित

पुष्प कंटकों में खिलते हैं, दीप अंधेरों में जलते हैं । आज नहीं , प्रह्लाद युगों से, पीड़ाओं में ही पलते हैं । किन्तु यातनाओं के बल पर, नहीं भावनाएँ रूकती हैं । चिता होलिका की जलती है, अन्यायी कर ही मलते हैं । ---अटल जी❤✨