स्वप्न पंछी

वो ना , बड़े सपने देखता कैसे सपने ?? फिल्मी पर्दे वाले ?? ना भई यथार्थ क़ी बीज से उत्पन्न हुए सपने तम की बेला में दीप लिए , जीवित सपने शिशु से कोमल , जरठ से प्रौढ़ सपने थोड़ा सा पाजीपन , थोड़ा प्रेमजाम पिएं सपने हां , अब कुछ सपने हक़ीक़त बनते कुछ [...]

प्रतीक्षा

क़ाश ये पल जल्द गुज़रे , छटे चांदनी रात , सूर्य पुनः निकले ; एक-एक क्षण अब अर्सो-सा लगता , चंद महीनों का साथ जन्मों-का लगता ; . कर हिम्मत कह डाला - हैं प्रेम तुझसे , शरमा गई , बोली 'कल' बतलाती तुम्हें ; उसका 'कल' मुझे आज से ही व्यग्र रखता हैं , [...]

प्रेम और स्त्री

प्रेम में पड़ी , स्त्री सब कुछ सहती है ; सींचती हैं प्रेम रुपी पौधें को , अपने नेत्रजल से ; प्रतिपल बचाती है.. निज़ प्रेम को , हर व्याध , हर एक अंधड़ से ; सँजो कर रखती हैैं खुद में उसे , मानों कोई कस्तूरी मृग में ; प्रेम में पड़ी स्त्री बिलकुल [...]