प्रेम और स्त्री

प्रेम में पड़ी , स्त्री सब कुछ सहती है ; सींचती हैं प्रेम रुपी पौधें को , अपने नेत्रजल से ; प्रतिपल बचाती है.. निज़ प्रेम को , हर व्याध , हर एक अंधड़ से ; सँजो कर रखती हैैं खुद में उसे , मानों कोई कस्तूरी मृग में ; प्रेम में पड़ी स्त्री बिलकुल [...]

उलटे पाँव

घर पर बंद पड़ा आदमी , निहारता है दीवार, अपने दादा-परदादा की स्मृतियों क़ो ; सिर पर हाँथ फ़ेर मुस्काता हैं , अपनी प्रेमिका को लिखें पुराने प्रेम पत्र पढ़कर ; खोज़ निकालता हैं , अपने पुराने खिलौने चीज़-समानों को ; लजाता हैं , स्वयं की किसी पुरानी तस्वीर देख कर ; जिंदगी की भागदौड़ [...]

ख़ीर

कभी कभी मै सोचता ये दिनभर दुःख , नकारात्मकता और रोने वाली बातें ही क्यों ढूंढ़ी जाए ...अरे भई खुशिया भी तो ढूंढ सकते ...खुशिया बना सकते ... परोस सकते ...क्यों ???☺  ख़ीर 😉 माँ का अनुपम प्रखर प्यार , गुमसुम हूँ मै ,पढ़ लेती आनन* हर इक राज ! घोर निशा का पहरा , [...]

चित्रकार

क़ाश मैं चित्रकार या कोई रंगसाज होता... फिर जब कभी-भी तुम उदास होती , तुम्हे सामने बिठाकर , मैं तुम्हारी  खिलखिलाती हुई तस्वीर बना देता ! तुम्हारे मुरझुराए जूड़े में एक गुलाब टाँक देता...अपने ब्रश से ! हां  तुम्हारी चाँद जैसी आँखों में , तनिक शरारत भर देता ! तुमसे कितनी बार कहा है उदास [...]

व्योम

दो दूनी चार , दो तिहाई छह , स्लेट पर चॉक घिसता , भू पर पलथी मारकर बैठा , वह बालक , नहीं देखता आलिसां भवन , मोटी कमाई ; शान-शौक़त और अफ़सर बनने के सपने ; वह तो घंटी बजने और घर लौट , माँ के हाथ से दूध-भात ; बाबा के कंधे पर [...]

विश्वास

क्यों ढूँढती हो सच्चाई , जब सच्चा दिल तुम लिये हुए हो !! विश्वास से भरा दिल हम लिए हुए हैं !! ज़माना देखेगा अब , सीखेगा अब.. कि सच्चाई और विश्वास से रुहानीं रिश्तें कैसे बनकर जुड़ते हैं.. कभी ना टुटनें के लिए ---निमिष