माँ

इक नन्हा नवसिखियां कवि मुझसा , जो लिखता कम , पढ़ता ज्यादा है ; अपनी पहली दोचार कविताएं माँ को ही समर्पित करता है !! ढूंढता फिरता हर क्षण वो उपमा , वो विशेषण वे शब्द श्रृंगार जिससे मातृत्व भाव को अधिक खूबसूरत दिखलाया जाय ; किन्तु ,भूल जाता है अनभिज्ञ , 'माँ' शब्द ही [...]

ख़ीर

कभी कभी मै सोचता ये दिनभर दुःख , नकारात्मकता और रोने वाली बातें ही क्यों ढूंढ़ी जाए ...अरे भई खुशिया भी तो ढूंढ सकते ...खुशिया बना सकते ... परोस सकते ...क्यों ???☺  ख़ीर 😉 माँ का अनुपम प्रखर प्यार , गुमसुम हूँ मै ,पढ़ लेती आनन* हर इक राज ! घोर निशा का पहरा , [...]